मीराबाई जीवन परिचय

मेड़ता के राठौड़ शासक राव रत्नसिंह की पुरी मीरा का जन्म 1498 ई . में मेड़ता पास ' बाजीली ' गाँव में हुआ तथा लालन - पालन कुड़की गाँव में हुआ । इनका पालन ऐषण इनके दादा राव दूदा ने किया । 1516 ई . में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा के ज्येष्ठ पुर भोजराज के साथ हुआ । भोजराज को आकस्मिक मृत्यु ने मीरा के जीवन को एकाकी व संघर्षमय बना दिया और वह संत सेवा व कृष्ण भक्ति में सीन हो गई । सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ के शासक विक्रमादित्य ने मीरा को कर पहुँचाए । फलतः वह चित्तौड़ का परित्याग कर वृन्दावन चली गई और वहीं चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूपगोस्वामी से दीक्षा ली । सगुण भक्ति संत मीरा में कृष्ण की भक्ति का बीजारोपण तो बचपन में हो हो गया था । मगर पति की मृत्यु के बाद इन्होंने तत्कालीन समाज को सभी रूड़ियों का त्याग कर अपने को संत संगति व कृष्ण भक्ति में निमग्न कर लिया और अंततः कृष्ण को ही अपना सर्वस्व मान लिया । ' माये तो गिरधर गोपाल , दूसरो न कोई । ' मीरा की भक्ति माधुर्य भव की थी । इनकी भक्ति की मुख्य विशेषता यह थी कि उनहोंने ज्ञान से अधिक भावना व ब्रद्धा को महत्व दिया । मीरा के अनुसार गायन , नृत्य और कृष्ण स्मरण ही भक्ति का सरत मार्ग है । मीरा ने भकित , वात्सल्य और भूगार की विगी से भजनों को प्रवाह व प्रखर रूप दिया । इन्होंने सामान्य बोलचाल की भाषा में अपने विचारों को प्रकट किया । राजस्थानी , ब्रज , गुजराती और पंजाबी भाषा में इनके द्वारा रचित पद मिलते हैं । ' सत्याभामा जी नू स्मणो ' , ' गीत गोविन्द को टीका ' , ' राग गोविन्द ' , ' मीरा री गरीबी ' , ' रुकमणी मंगल ' आदि मीरा द्वारा रचित प्रमुख रचनाएँ हैं । मीरा अपने प्रियतम कृष्ण को खोजती हुई अंतत : द्वारका चली गई । माना जाता कि गुजरात के डाकोर नामक स्थान पर स्थित रणछोड़ मंदिर में कृष्णभक्ति करते र मीरा कृष्ण में विलीन हो गई ।

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