संत दादूदयाल दादू पंथ

संत दादूदयाल दादू पंथ के प्रवर्तक दादू दयाल का जन्म अहमदाबाद में 1544 ई . में इनका लालन - पालन लोदीराम ब्राह्मण ने किया । संत ब्रह्मानन्द दादू के गुरु ई . में इन्होंने सांभर में धुनियाँ का कार्य शुरू किया और यहीं पर सर्वप्रथम जनसाधारण को अपने उपदेश दिए । इन्होंने हिन्दू - मुसलमानों के धार्मिक अंधति का खण्डन किया , जिससे सांभर के काजी द्वारा इन्हें प्रताड़ित भी किया गया । सीन इन्होंने अपनी विचारधारा को नहीं छोड़ा । सांभर में इनके काफी शिष्य हो गए थे । यहीं से दादूपंथ का आरंभ माना जाता है । सांभर में ही 1575 ई . में इनके पहले ही गरीबदास का जन्म हुआ । बाद में एक पुत्र मिस्किनदास और दो पुत्रियां शोभाकरी और रूपकंवरी और हुई । 1585 ई . में इन्होंने फतेहपुर सीकरी में मुगल सम्राट अाय से भेंट की । तत्पश्चात् आमेर , जयपुर , मारवाड़ आदि स्थानों में भ्रमण करते हुए कहा अपने विचारों का प्रचार किया । अंत में ये ' नरायणा ' आ गए और यहीं 160313 इनका देहांत हो गया । यही इस पंथ का प्रमुख पीठस्थल है । दादू ने ब्रह्म , जीव , जगत और मोक्ष पर अपने उपदेश सरल मित्र हिन्दी ( सधुक्याड़ी में दिए । दादू के 152 प्रधान शिष्य थे , जिसमें से 100 शिष्य एकान्तवासी थे , किंग शिष्यों ने स्थान - स्थान पर दादारों की स्थापना की । इन्हें दादू पंथ का बावन म्यान भी कहा जाता है । ' दादूजी की वाणी ' तथा ' दादरा दहा ' नामक ग्रंथों में दादू के उपदेश और विचार संगृहीत हैं । दादू कबीर की ही तरह सुधारवादी , आचरण और मेह मूल्यों को मानने वाले , परमतत्व की खोज की ओर उन्मुख थे । इसलिए इन्हें राजस्थान का कबीर ' भी कहा जाता है । दादू ने परब्रह्म को आदि गुरु माना है और राम व मला में भेद नहीं माना है । दाद ने कर्मकाण्ड , जातिप्रथा , मूर्तिपूजा , रूढ़िवादिता आदि । घोर विरोध किया । गरीबदास , मिस्किनदास , सुन्दरदास , बखनाजी , रजन , माधोधन दादू के प्रसिद्ध शिण थे ।

No comments:

Post a Comment