संस्कृति , परम्परा एवं विरासत

राजस्थान का इतिहास , संस्कृति , परम्परा एवं विरासत लिया । भंवरलाल कवि से तथा कल्याणदास करौली प्रजामण्डल करौली में रचनात्मक कार्यों द्वारा जनजागृति का शुरुआत ठाकुर पूर्णसिंह मदनसिंह ने की । मदनसिंह ने सुअर मारने पर प्रतिबंध हटाने , प्रशासन प्रयोग व बेगार समाप्ति की मांग को लेकर अपनी पत्नी के साथ अनशन कि के दबाव के कारण शासन ने इनकी मांगों को स्वीकार कर लिया । ने खादी प्रचार द्वारा , चिरंजीलाल ने हरिजनोद्धार के माध्यम से तथा कल रामगोपाल ने बेगार विरोधी आंदोलन एवं समाचार पत्रों के माध्यम से करौली में चेतना और जन - जागृति पैदा करने का कार्य किया । 1938 ई . में त्रिलोकचन्द माथुर ने अपने साथियों के साथ करौली प्रजाम स्थापना की । प्रजामण्डल ने जनता की सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक दशा का लक्ष्य रखा । प्रारंभ में इसने उत्तरदायी शासन की मांग भी नहीं की । फिर भी सरकार द्वारा प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसाकर परेशान किया गया अप्रैल , 1939 में करौली में प्रजामण्डल के अधिवेशन में प्रशासनिक सुधारों की मांग की गई । प्रजामण्डल ने बंजर भूमि पर लगान नहीं लेने , बेगार समाप्त करने , किसने को ऋण देने के लिए सरकारी समितियों की स्थापना करने तथा स्थानीय स्वशासन स्थापित करने की भी मांग की । राज्य ने प्रजामण्डल की मांगों पर ध्यान देने के बजाय इससे जुड़े लोगों को उत्पीड़ित किया । ' भारत छोड़ो ' आंदोलन के दौरान प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनों और भाषा के द्वारा आंदोलन को गतिशील रखा । सरकार ने प्रजामण्डल के कई कार्यकतोआ के बना लिया । नवम्बर , 1946 में राजपूताना के राज्यों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सम्मेलन करौली में हुआ , जिसमें पहली बार करौली में उत्तरदायी शासन स्थ मांग की गई । प्रजामण्डल ने राशन पद्धति की बुराइयों और दमनकारी का में सभाएं की और जुलूस निकाले । फलतः राज्य ने जुलाई , 1947 में से के लिए एक समिति नियुक्त की , लेकिन इसमें प्रजामण्डल के ए . र दमनकारी कानूनों के विरोध तुलाई , 1947 में संवैधानिक सुधार जामण्डल के एक भी सदस्य के : को करौली के ' मन उत्तन सम्मिलित नहीं करने से आंदोलन चलता रहा । 18 मार्च , 19 संघ ' में विलय तक उत्तरदायी शासन स्थापित करने की दिशा म करने की दिशा में कदम नहीं उठाया चार सुधारिणी स घौलपुर प्रजामण्डल 11910 ई . में ज्वाला प्रसाद और यमुना प्रसाद ने और 1911 ई . में ' आर्य समाज ' के माध्यम से जन चेतना 1918 ई . में स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्य समाज ने फलतः आर्य समाज के कई कार्यता माध्यम से जन चेतना जागृत करने के समाज ने स्वशासन आंदोलन

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