मेहरानगढ़ का किला

मेहरानगढ़ का किला , जोधपुर मेहरानगढ़ के किले का निर्माता जोधपुर नगर का संस्थापक 1489 ई . ) था । राव जोधा ने 13 मई , 1459 को चिड़ियाट्रक ना चिड़ियानाथ के नाम पर , जिनका स्थान आज भी किले के पीछे विता की नींव रखी । ऐसी मान्यता है कि किले की नीव में राजिया नामक दफन किया गया । मयूराकृति का होने के कारण जोधपुर के किले को भी कहा जाता है राव जोधा ने इस किले के चारों ओर एक नगर बसायी जो उनके नाम पर जोधपुर कहलाया । राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों में सबसे किला अपनी विशालता के कारण ' मेहरानगढ़ ' कहलाया । के पीछे विद्यमान है ) पर किन या नामक व्यक्ति को जित के किले को ' मयूरध्वज गव ' और एक नगर बसाया ( 14598 । तीय दर्गों में सबसे प्रमुख , यह माधोप बीच और व के संब किला जमीन दुर्गम मेहरानगढ़ किला भूमितल से लगभग 400 फीट ऊँचा है । किले के चारों को मुद परकोटा है जो लगभग 20 फीट से 120 फीट तक ऊँचा और 12 से 20 फीट तक चौड़ा है । किले की लम्बाई 500 और चौड़ाई 250 गज है । इसकी प्राचीर में विशाल बुर्जे बनी हुई हैं । मेहरानगढ़ के दो बाह्य प्रवेशद्वार हैं - उत्तर - पूर्व में जयपोल तथा दक्षिण - पश्चिम में फतेहपोल । ध्रुवपोल , सूरजपोल , इमरतपोल , भैरोंपोल आदि म प्रवेश द्वार हैं । 1544 ई . में इस किले पर शेरशाह सूरी ने अधिकार कर लिया था । लेकिन 1545 ई . में मालदेव ने पुनः इसे अपने आधिपत्य में ले लिया । 1565 ई . में मुगल सूबेदार हसन कुली खाँ ने चन्द्रसेन का आधिपत्य समाप्त कर इस पर मुगल आधिपत्य से स्थापना की । मुगल आधिपत्य स्वीकार करने पर मोटा राजा उदयसिंह को 1582 जागीर के रूप में दे दिया गया । 1678 ई . में औरंगजेब ने इसे मुगल राज्य में मिला 1707 ई . में औरंगजेब की मृत्यु होने पर अजीतसिंह ने मुगल सूबेदार जफर कुता से इसे छीन लिया । तब से ये राठौड़े का निवास स्थान रहा है । ब्रिटिश सा रूडयार्ड किपलिंग ने एक लंबा समय इस किले में बिताया । उसने इ " देवताओं परियों और फरिश्तों द्वारा निर्मित माना है । " लाल पत्थरा सनगद स्थापत्य कला की दृष्टि से बेजोड है । महाराजा सूरसिह मातामहत सुनहरी अलंकरण के लिए प्रसिद्ध है । इसकी छत व दाव महाराजा तस्तसिंह की देन है । अभयसिंह द्वारा निर्मित फूलमा लिए प्रसिद्ध है । तख्त विलास , अजीत विलास , उम्मद आदि का भीतरी वैभव दर्शनीय है । महलों में नक्काशी , मेहराबों , झ ॥ हरत में डालने वाली है । चोखेलाव महल , विचला महल , महा घाटी में नीचे है । हो गया बताया । उसने इस किले को लाल पत्थरों से निर्मित सूरसिंह द्वारा मिति तव दीवारों पर सोने का पौलिक का कार्य महाराजा तरतसिंह को दन हा पर बारीक खुद के लिए प्रसिद्ध है । तखत विलास , में रणथा उसने का है । ती , मेहराबों , झरोखों और

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