भारत में पशु गणना

भारत में प्रथम पशु गणना दिसंबर 1919 से अप्रैल 1920 के मध्य हुई। तथा पशु गणना राजस्थान की जयपुर बीकानेर जोधपुर कोटा बूंदी टोंक किशनगढ़ आदि रियासतों में प्रथम पशु गणना हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वप्रथम 1951 में पशु गणना हुई उस समय राजस्थान में 255.16लाख थे नवीनतम पशु गणना 15 अक्टूबर 2012 में की गई जो 19वीं पशु गणना है। पशु गणना का कार्य राजस्थान में प्रति 5 वर्ष में राजस्व मंडल अजमेर करता है तथा राजस्थान के दूध पैदा करने वाली सरकारी एजेंसी का नाम सरस है।
प्राकृतिक संसाधनों प्रकृति एवं उपलब्धि के आधार पर पशुधन उद्योग के विकास में सर्वाधिक संभावनाएं हैं राजस्थान में पशुधन की अधिकता होने के बावजूद यहां चिकित्सा के पशुओं की कमी है इसी कारण दुग्ध व्यवसाय के अविकसित अवस्था में है।
राजस्थान में 2012के अंतिम पशु गणना के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में 5 पॉइंट 77 करोड़ पशु एवं 80 पॉइंट 24 लाख मुर्गियां है।
वर्ष 2007 की तुलना में 2012 में राज्य की पशु संपदा 10.69 लाख की वृद्धि हुई है तथा राज्य में सर्वाधिक पशु घनत्व दौसा व राजसमंद  में है जबकि न्यूनतम पशु घनत्व जैसलमेर में है तथा राज्य का सर्वाधिक पशुधन कर्म से बाड़मेर में जबकि सबसे कम धौलपुर में है।
भारत का मवेशियों की संख्या के लिए आज में विश्व में दूसरा स्थान है तो पशु संपदा की दृष्टि से राजस्थान का देश में दूसरा स्थान जबकि प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश का है तथा इस पशु गणना मैं सर्वाधिक वृद्धि कानों में देखी गई है जबकि न्यूनतम वर्दी ऊंट के गद्दे में रही है।
राजस्थान में पशु संपदा 2012 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार स्थान में बकरियों की कुल संख्या 216.65है। गायो की संख्या 133.24है। तथा भैंस की संख्या 129.76है।
राजस्थान में कृषि से संबंधित क्रांतियां:-हरित क्रांति गेहूं तथा खाद्यान्न से संबंधित पीली क्रांति तिलहन व सरसों तथा श्वेत क्रांति दूध से सम्बंधित है।

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