अंतरिक्ष की जानकारी

खगोल विद अंतरिक्ष की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्राचीन काल से ही प्रयत्नशील रहे हैं। जिनमें प्रमुख रूप से आर्यभट्ट वेराई नियर भास्कर चार्य जीटीए आदि है आर्यभट्ट भारत के महान खगोल विद थे जिनकी मान्यता दी कि पृथ्वी गोल है उन्होंने कहा पृथ्वी स्थिर नहीं है।
यह बात ईसा पूर्व पांचवी सदी में ही बता दी थी इसके घूमने के कारण ही हमें लगता है कि तारे उड़ जावे अर्थ होते हैं उन्होंने पृथ्वी की परिधि लगभग 24835 मील बताई थी जो कि आधुनिक काल के वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई प्रीति 24901 मिली मिल के लगभग बराबर है उन्होंने चंद्रचंद्र ग्रहण चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ना बताया था जो अटल सत्य भारत द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम भी आर्यभट्ट रखा गया है यूनान में भी हिस्सा पूर्व चौथी सदी से अंतरिक्ष ज्ञान विज्ञान का विकास होने लगा इसमें प्रमुख दार्शनिक प्लेटो अरस्तु और टेल मे थे उस समय माना जाता था कि पृथ्वी केंद्र में है और सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार मार्ग में चक्कर लगाता है यह धारणा 16वीं सदी तक बनी रही जिसे काॅपरनिकस ने  गलत साबित किया पृथ्वी की सही परिधि का आंकलन विराट और दिनेश ने ईसा पूर्व तीसरी सदी में किया भारत के प्रसिद्ध खगोल शास्त्रियों मे  भास्कराचार्य द्वित्तीय प्रसिद्ध है तथा इनका जन्म ग्यारह सौ 14 ईसवी में हुआ था। किस विद्वान ने मात्र 36 वर्ष की आयु में सिद्धांत शिरोमणि नामक ग्रंथ की रचना की उनका मानना था कि पृथ्वी गोलाकार है तथा अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण सब चीजों की अपनी ओर खींचती है।
इससे स्पष्ट है कि भारतीय खगोल शास्त्रियों ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत पृथ्वी के घूर्णन तथा परिक्रमण आदि का प्रतिपादन न्यूटन से कई सदियों पूर्व ही कर लिया था।
भास्कराचार्य के ग्रंथों में अंकगणित बीजगणित ज्यामिति शास्त्र आदि का विस्तृत विवरण मिलता है

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