राज्यपाल का पद

     राज्यपाल का पद
*स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देसी रियासतों के एकीकरण के बाद राजस्थान में राज्य प्रमुख का पद सृजित किया गया था राज राज्य के पहले वे एकमात्र राज्य प्रमुख 30 मार्च 1949 को जयपुर के भूतपूर्व महाराजा सवाई मानसिंह बनाए गए जिन्होंने 1 नवंबर 1956 तक कार्य किया राजस्थान में 1 नवंबर 1956 को राज्य के पुनर्गठन के बाद राजप्रमुख के स्थान पर राज्यपाल का पद सृजित हुआ राज्य के प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह बने
*राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है राज्य की समस्त कार्यपालिका में विदाई शक्तियां राज्यपाल में निहित होती है वह राज्य का प्रथम नागरिक होता है संविधान के अनुच्छेद 153 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल की व्यवस्था की गई है
नियुक्ति एवं कार्यकाल :संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति केंद्रीय मंत्री परिषद की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत अपने पद पर बना रहता है राष्ट्रपति कभी भी राज्यपाल को पद मुक्त कर सकता है उसे समय से पूर्व वापस बुला सकता है सामान्यतया राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का है
राज्यपाल की योग्यताएं: वह भारत का नागरिक होना चाहिए कम से कम 35 वर्ष की आयु  का होना चाहिए राम वह केंद्र या राज्य विधायिका का सदस्य ने हो यदि वह सदस्य है तो राज्यपाल का पद ग्रहण करते हैं उसका पद रिक्त माना जाएगा राम वह सरकार के किसी लाभ के पद पर नियुक्त में हो
शपथ :राज्यपाल को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अथवा उसकी अनुपस्थिति की दशा में वरिष्ठ न्यायाधीश पद की शपथ दिलाता है
त्यागपत्र :राज्यपाल राष्ट्रपति को संबोधित अपना लिखित में हस्ताक्षरित त्याग पत्र प्रेषित कर कभी भी पद मुक्त हो सकता है
राज्यपाल की शक्तियां :अनुच्छेद 163 राज्यपाल की शक्तियां को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है
(1)वह शक्तियां जिनका प्रयोग वह मुख्यमंत्री की सलाह से करता है
(2) वे शक्तियां जिनका प्रयोग वह श्री विवेक के आधार पर करता है
(1)राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियां: संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य के समस्त कार्य कारी शक्तियां राज्यपाल में निहित होती है वह राज्य सरकार की कार्यपालिका का प्रधान होता है राज्य सरकार का सारा कार्य राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है राज्यपाल की कार्यकारी शक्तियां उन सभी विषयों पर लागू होती है जिन पर राज्य के विधानमंडल को विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त है राज्यपाल की कार्यकारी शक्तियां प्रमुख रूप से निम्न है-
*राज्यपाल मुख्यमंत्री व उसकी सलाह से मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति करता है तथा उनके मध्य कार्य का विभाजन करता है राज्यपाल सामान्य थे बहुमत दल के नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करता है किसी भी दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होने पर राज्यपाल श्री विवेक से उस दल के नेता को मुख्यमंत्री पद के लिए आमंत्रित करता है जो विधानसभा में बहुमत सदस्यों का विश्वास प्राप्त कर लेगा
*राज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता एवं लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत अपने पद पर बना रहता है
*राज्यपाल राज्य के सभी विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति होता है तथा विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति करता है
*राज्यपाल मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद को पद व उसकी गोपनीयता की शपथ दिलाता है आवश्यकता पड़ने पर उन्हें पदच्युत करता है एवं उन के त्याग पत्र स्वीकार करता है
            राज्यपाल की अन्य कार्यकारी शक्तियां
*राज्यपाल राज्य मामलों के प्रशासन वह विधायक के प्रस्ताव से संबंधित कोई भी सूचना मुख्यमंत्री से मांग सकता है
*वह राज्य के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की नियुक्ति करता है
* विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के सदस्यों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो राज्यपाल और समुदाय के एक सदस्य को मनोनीत करता है
*यदि राज्य में विधान परिषद भी विद्यमान है तो राज्यपाल को विधान परिषद के कुल सदस्यों के 1/ 6 भाग हेतु ऐसे व्यक्तियों को मनोनीत करने का अधिकार है जिन्हें साहित्य विज्ञान काला सहकारी आंदोलन और समाज सेवा आदि विषयों के संबंध में व्यवहारिक ज्ञान विशेष अनुभव हो
 *राज्य की सिविल सेवाओं के सदस्य राज्यपाल के नाम पर नियुक्त किए जाते हैं और वे राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत पद धारण करते हैं
*राज्यपाल राज्य के लोकायुक्त की नियुक्ति करता है
*राज्यपाल राज्य में संवैधानिक संकट उपस्थित होने अथवा राजनीतिक स्थिरता या अन्य किसी कारण से संवैधानिक तंत्र की असफलता की स्थिति उत्पन्न होने पर राज्य की स्थिति के संबंध में राष्ट्रपति को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है उसके प्रतिवेदन के आधार पर अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है इस स्थिति में राज्यपाल सरकार के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है इसे राज्यपाल की आपातकालीन शक्ति भी कहा जा सकता है
               (2) राज्यपाल की विधायी शक्तियां
*राज्यपाल व्यवस्थापिका का प्रमुख होता है
*उसे राज्य विधान सभा का अधिवेशन बुलाने उसका सत्रावसान करने तथा किसी भी समय विधानसभा को भंग करने का अधिकार प्राप्त है
*साधारणतया आम चुनाव के बाद नहीं विधानसभा बनाने पर वह उद्घाटन भाषण देता है राज्यपाल हर वर्ष सदन के पहले सत्र को संबोधित करता है अतः अभी भाषण देता है
*विधान मंडल द्वारा पारित कोई विधेयक तब कानून का रूप धारण नहीं करता जब तक राज्यपाल उस पर अपनी स्वीकृति नहीं देता वह चाहे तो विधेयक पर हस्ताक्षर सकता है या सदन के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है या विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचारात्मक चित कर सकता है वैसे विधायक को यदि विधानसभा द्वारा संशोधन साहित्य संशोधन रहित दोबारा राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल को हस्ताक्षर करना आवश्यक होता है
*वित्त विधेयक को राज्यपाल पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता
*राज्यपाल को राष्ट्रपति के सम्मान ही अध्यादेश जारी कर कानून निर्माण का अधिकार है राष्ट्रपति या राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह पर विधानमंडल के सत्र में होने पर किसी आपातकालीन निर्णय की आवश्यकता पूर्ण करने हेतु अनुच्छेद 213 एक के तहत राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है यह अध्यादेश विधानमंडल द्वारा पारित कानून की भांति प्रभावी होता है यह अध्यादेश विधानसभा सत्ता में आने के 6 सप्ताह तक जारी रहते हैं इन 6 सप्ताह के अंदर भी यदि विधानमंडल उन्हें स्वीकृत नहीं करता है तो स्वयं समाप्त हो जाते हैं राज्यपाल इन आदेशों को पहले भी वापस ले सकता है
(3) राज्यपाल की वित्तीय शक्तियां
*राज्यपाल वित्तीय वर्ष प्रारंभ होने से पूर्व वार्षिक वित्तीय विवरण एवं बजट विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करवाता है
*वित्तीय विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुमति के बाद ही राज्य विधान मंडल में प्रस्तुत किए जाते हैं
 *पंचायतों में नगर पालिका की वित्तीय स्थितियों की समीक्षा के लिए वे प्रत्येक 5 वर्ष पर 1 वित्त आयोग का गठन करता है
(4) राज्यपाल की न्यायिक शक्तियां:
राज्यपाल राज्य सूची में दिए गए विषयों के संबंध में न्यायालय द्वारा दंडित किए गए व्यक्तियों को समा कर सकता है तथा दंड को निलंबित या स्थगित कर सकता है परंतु मृत्युदंड के संबंध में यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है
(5) राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां:
संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को कतिपय विवेकाधीन शक्तियां दी गई है इस बात का निर्धारण करना स्वयं राज्यपाल का क्षेत्राधिकार है कि कौन सा कार्य उसके विवेका अधिकार के अंतर्गत आता है राज्यपाल के इस निर्णय को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल अपने विवेक या व्यक्तिगत निर्णय से करता है उसे इस संबंध में मंत्रिपरिषद पर परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां निम्न है-
संविधान द्वारा प्रदत शक्तियां: 
राज्य विधान मंडल द्वारा प्रस्तुत किसी विधेयक को अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राष्ट्रपति के विचार आज आरक्षित रखने की शक्ति राज्यपाल के स्वर विवेक के अधीन है विधायक निम्न स्थितियों में राष्ट्रपति के विचार आज सुरक्षित रखा जा सकता है
(1) विधायक असंवैधानिक प्रतीत हो
(2) देश के व्यापक हित के विरुद्ध हो या राष्ट्रीय महत्व का हो
(3) नीति निर्देशक तत्वों के परोक्ष रूप से विरुद्ध हो
(4) उच्च न्यायालय की स्थिति को खतरे में डालता हो
(5) विधायक अनुच्छेद 31(3) के तहत संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित हो
परिस्थितिजन्य विवेकाधीन शक्तियां-
निमन परिस्थितियों में राज्यपाल को  विवेक से निर्णय लेने का अवसर प्राप्त होता है-
(1) राज्य विधानसभा में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त में हो या सरकार को बहुमत का विश्वास नहीं रहा हो
(2) विभिन्न दलों की संयुक्त सरकार का गठन हो और उसमें आप से विचार विभिन्न नेता के कारण शासन का संचालन सुचारु रुप से चलना असंभव हो रहा हो
(3) राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया हो या उसकी आशंका हो
(4) मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त करना राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री से सूचनाएं प्राप्त करना भी विवेका अधिकार के अंतर्गत आता है अनुच्छेद 167( ए )के अनुसार यह मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वह मंत्रिमंडल के राज्य प्रशासन संबंधी तथा नहीं विधायकों संबंधी निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराएं
* श्रीमती प्रतिभा पाटिल राज्य की प्रथम महिला राज्यपाल बनी थी वह यहां से इस्तीफा देखकर देश के राष्ट्रपति निर्वाचित हुई
* राज्यपाल श्री दरबार सिंह, श्री निर्मल चंद जैन ,श्री शैलेंद्र सिंह ,एवं श्रीमती प्रभा राव ,का राज्यपाल पद पर रहते हुए निधन हो गया था
* राज्य के सर्वाधिक समय तक रहे राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह थे

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