महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

    महाराणा प्रताप का जीवन परिचय  


जन्म = 9 मई 1540
स्थान =कुंबलगढ के बादल महल मे 
पिता =उदयसिंह
माता =जैवंता बाई 
*महाराणा प्रताप का बचपन कुम्भलगढ दुर्ग मे व्यतीत हुआ महाराणा परताप का विवाह 1557 मे अजब दे पवार के साथ हुआ जिनसे 16 मार्च 1559 मे अमरसिह का जनम हुआ  महाराणा परताप 32 वर्ष की उम्र के थे तब उनके पिता उदयसिंह की होली के दिन 28 फरवरी 1557 गोगुन्दा में मृत्यु हो गयी  उदयसिंह का गोगुन्द में ही दहसंस्कार किया गया यहां स्थित महादेव बावड़ी पर 28 फरवरी 1557 को मेवाड़ के सामंतो एव प्रजा ने प्रतापसिंह का महाराणा के रूप में राजतिलक किया 
*1570 में अकबर का नागौर में दरबार लगा जिसमे मेवाड़ के अलावा अधिकतर राजपूतो ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली  अकबर ने परताप को अधीनता स्वीकार करवाने के लिए चार दल भेजे जिनमे -
पहली बार -जलाल खा जिसको नवम्बर 1572 में परताप के पास भेजा 
दूसरी बार -जून 1573 में मानसिह को परताप को समझाने भेजा 
तीसरी बार -अक्टुम्बर 1573 मे आमेर के भगवानदास को भेजा 
चौथी बार -दिसम्बर 1573 में टोडरमल को भेजा 
*ये चारो सिस्टमण्डल प्रताप को समझाने में असफल रहे तो अकबर ने परताप को युद्ध में बंदी बनाने की योजना बनाई बंदी बनाने की योजना अजमेर के किले में बनाई गयी जिसमे आज संग्रालय स्थित है तथा  अंग्रेजो के समय का सशत्रागार होने के कारण इसे मैगजीन भी कहते हे अकबर ने मानसिह को इस युद्ध का मुख्य सेनापति बनाया तथा मानसिह का सहयोगी आसफखां को नियुक्त किया गया
*मानसिंह 3 अप्रैल 1576 को शाही सेना लेकर अजमेर से रवाना हुआ उसने पहला पड़ाव मांडलगढ़ में डाला दो माह तक वहीं पर है उसके बाद है आगे नाथद्वारा से लगे हुए खमनोर के मूल लैला नामक गांव के पास अपने पड़ाव डाला उधर इस शाही सेना के आगमन की सूचना महाराणा प्रताप को मिल गई
*महाराणा प्रताप ने गोगुंदा और खमनोर की पहाड़ियों के मध्य स्थित हल्दीघाटी नामक तंग घाटी में अपना पड़ाव डाला है इस गाड़ी में एक बार में एक आदमी प्रवेश कर सकता था इसलिए सैनिकों की कमी होते हुए भी महाराणा प्रताप ने के लिए मोर्चा बंदी के लिए बस यह सर्वोत्तम स्थान था जहां पर ताव के पहाड़ों से परीक्षित से ने आसानी से छिपकर आक्रमण कर सकते थे वही मुगल सैनिक भटक कर मेवाड़ के सैनिकों से टकरा कर या भूखे प्यासे मर कर जीवन गमा सकते हैं दोनों सेनाएं 18 जून 1576 को प्रातकाल युद्ध बेरी के साथ आमने-सामने हुई
राजपूतों ने मुगलों पर पहला बार इतना कर्म किया कि मॉडल सैनिक चारों और जान बचाकर भागे यह प्रथम चरण के युद्ध में हकीम खां सूर का नेतृत्व सफल रहा मुगल इतिहासकार बंदा यूनी जो कि मुगल सेना के साथ था वह स्वयं भी उस युद्ध से भाग खड़ा हुआ मुगलों की आरक्षित फौज के प्रभारी 72 खाने यह झूठी अफवाह फैला दी की बार 7 वर्षों से सेना लेकर आ रहे हैं अकबर के सहयोग की बात सुनकर मुगल सेना की हिम्मत बंधी और पुणे युद्ध के लिए तत्पर और आगे बढ़ी राजपूत भी पहले मोर्चे में सफल होने के बाद बनास नदी के किनारे वाले मैदान में जिसे रक्तदान कहते हैं उसमें आज हमें इस युद्ध में राणा और से पूना व रामप्रसाद हाथी और मुगलों की ओर से गजमुक्ता व गजराज के मध्य युद्ध हुआ रामप्रसाद हाथी के महावत के मारे जाने के कारण रामप्रसाद हाथी मुगलों के हाथ लग गया राम सा धरती अकबर के लिए बड़े महत्व का था जिसका नाम अकबर ने पीर प्रसाद कर दिया था
महाराणा प्रताप की नजर मुगल सेना के सेनापति मानसिंह पर पड़ी स्वामी भक्त घोड़े चेतक ने स्वामी का संकेत समझ कर अपने कदम उस और बढ़ाएं जिधर मुगल सेनापति मानसिंह मर्दाना नामक हाथी पर बैठा हुआ था चेतक ने अपने शेर हाथी के सिर पर टिका दिए महाराणा प्रताप ने अपने पाले का भरपूर पर हार मानसिक पर किया परंतु मानसिंह पौधे में छिप गया और उसके पीछे बैठा अंगरक्षक मारा गया जय हो देखी छतरी का एक खंभा टूट गया इसी समय हाथी की सूंड से बंधे हुए जहरीले से चेतक की टांग कट गई
उसी समय मुगलों की शाही सेना ने प्रताप को चारों ओर से घेर लिया बड़ी सादड़ी का झाला मन्ना सेना को चीरता हुआ राणा के पास पहुंचा और महाराणा से निवेदन किया कि आप राज सिंह उतार कर मुझे दे दीजिए और आप इस समय युद्ध के मैदान से चले जाएं इसी में मेवाड़ की भलाई है चेतक के घायल होने की स्थिति को देखकर राणा ने वैसा ही किया राज सिंह के बदलते ही सैनिक सैकड़ों तलवारें झाला मन्ना पर टूट पड़ी झाला मन्ना इन पहाड़ों का भरपूर सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ
महाराणा प्रताप का स्वामी भक्त घोड़ा चेतक बलीचा गांव में स्थित एक छोटा नाला पार करते हुए परलोक सिधार गया इसी जगह बलीचा गांव में चेतक की छतरी बनी हुई है महाराणा प्रताप जो कभी भी किसी परिस्थिति में नहीं रहे परंतु चेतक की मृत्यु पर उनकी आंखों में आंसू निकल पड़े उसी समय नीला घोड़ा रा असवार शब्द राणा ने सुने प्रताप में सिर उठा कर देता तो सामने उसके भाई से किसी को पाया शक्ति सिंह ने अपने करने पर लज्जित होकर बड़े भाई के चरण पकड़ कर शमा याचना की महाराणा प्रताप ने उन्हें गले लगाया और क्षमा कर दिया इसकी जानकारी हमें अमर काव्य वंशावली ग्रंथ विराज प्रसिद्ध से मिलती है जिसकी रचना संस्कृत भाषा में रणछोड़ नामक विद्वान ने की
कुछ इतिहासकारों ने इसे परिणाम विभिन्न तत्व इंग्लिश युद्ध के संज्ञा दी है
अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को जीवित पकड़कर मुगल दरबार में खड़ा करना अथवा मार देना था या फिर उसका संपूर्ण राज्य अपने साम्राज्य में मिला देना था लेकिन अकबर इन उद्देश्यों में विफल रहा
मुगल सेना की विजय प्रमाणित नहीं होती है क्योंकि अकबर की मानसिंह वेयर साबका के प्रति नाराजगी जिसमें उनकी जोड़ी बंद कर दी गई मुगल सेना का मेवाड़ में बेकस होकर समय निकालना एवं मेवाड़ की सेना का पिक्चर नहीं करना ऐसे परिदृश्य हैं जो हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम प्रताप के पक्ष में लाकर खड़ा कर देते हैं
विदेशी इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड़ की धर्मों पल्ली और दीवार को मेवाड़ का मैराथन कहा है
1597 से में धनुष की प्रसंता चढ़ाते हुए महाराणा प्रताप के चोट लगी जिसके कारण 19 जनवरी 1597 ईस्वी को उसके चावंड में मृत्यु हो गई चांद से 11 मील दूर बडोली गांव के निकट रहने वाले नाले के तट पर महाराणा का दाह संस्कार किया गया के खेजड़ बांध के किनारे 8 खंभों की छतरी आज भी हमें उस महान योद्धा की याद दिलाती है
प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर के कानों तक पहुंचा तो उसे भी बड़ा दुख हुआ इसी स्थिति का वर्णन अकबर के दरबार में उपस्थित दूर सा अड्डा ने इस प्रकार किया - किराणा तेरी मृत्यु पर बादशाह ने दांत में जीव दवाई और नीम श्वास से आंसू टपका है क्योंकि तूने अपने घोड़े को नहीं दबाया और अपनी पगड़ी को किसी के सामने नहीं झुकाया वास्तव में तो सब तरह से जीत गया

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