वैश्वीकरण

                      वैश्वीकरण

वैश्वीकरण का सर्वाधिक प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ा है पश्चिम में पूंजीवादी देश एशिया और अफ्रीका में अपने उत्पादों के लिए बाजार ढूंढने में का प्रयत्न कर रहे थे प्रत्येक देश ने अपना बाजार विदेशी वस्तुओं की बिक्री के लिए खोल दिया है अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन दुनिया में आर्थिक नीतियों के निर्धारण में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं यह संस्थाएं शक्तिशाली पूंजीवादी ताकतों के प्रभाव के क्षेत्र में कार्य कर रही है यद्यपि पिछड़ी अर्थव्यवस्था को भी काफी लाभ हुआ है लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ है चीन भारत व ब्राजील जेसी प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं को पिछले अव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक लाभ हुआ है विश्व के विभिन्न देशों में आर्थिक प्रभाव तेज हुआ है पूर्व में विभिन्न देश आयात पर प्रतिबंध अधिक लगा देते परंतु वैश्वीकरण के दौर में प्रतिबंध कमजोर हो गए हैं अब धनी देश के निवेश करता अपना विनिवेश अन्य देशों में कर सकते हैं भारत ब्राज़ील जैसे विकासशील देश विदेशी निवेश के विशेष आकर्षण है
पूंजीवादी देशों कोई से अधिक मुनाफा होता है वैश्वीकरण ने पूरे दुनिया में वैचारिक क्रांति लाने का कार्य किया है अब विचारों के आदान-प्रदान में राष्ट्रीय समूह का असर समाप्त हो गया है इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं जैसे बैंक की ऑनलाइन शॉपिंग परिवारिक लेनदेन तो बहुत सरल हो गए हैं लेकिन जितना तेज वस्तु और पूंजी का प्रवाह बड़ा है उतनी तेज लोगों की आवाज आए नहीं बढ़ सकी है विकसित पूंजीवादी देशों ने अपनी वीजा नीति को 9 11 की आतंकवादी घटना के बाद अत्यंत कठोर कर दिया है ऐसा मुख्य रूप से इस कारण से हुआ है कि यह देश आशंकित है की अन्य देश के नागरिक उनके नागरिकों की नौकरी व्यवसाय ने हथिया ले
वैश्वीकरण का अलग-अलग देशों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ा है कुछ देशों की अर्थव्यवस्था तेज गति से प्रगति कर रही है वहीं कुछ देश आर्थिक रूप से पिछड़ गए हैं वैश्वीकरण के दौर में सामाजिक न्याय की स्थापना अभी भी संकट में है सरकार का संरक्षण छिन जाने के कारण समाज के कमजोर तबकों को लाभ के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है कई विद्वान वैश्वीकरण के दौर में पिछड़े लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवच तैयार करने की बात कर रहे हैं कुछ लोग वैश्वीकरण को नव उपनिवेशवाद का नाम देकर निंदा कर रहे हैं जबकि वैश्वीकरण के पक्ष कारों का मानना है कि वैश्वीकरण से विकास से संबंधित दोनों बढ़ती है खुले पन के कारण आम आबादी की खुशहाली बढ़ती है हर देश वैश्वीकरण से लाभान्वित होता है
* वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव:
वैश्वीकरण में ने केवल राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित किया है आप भी तो इसका लोगों के सांस्कृतिक जीवन पर भी काफी प्रभाव पड़ा है इसका विश्व के देश की स्थानीय संस्कृतियों पर मिश्रित प्रभाव पड़ा है इस प्रक्रिया से विश्व की परंपरागत संस्कृतियों को सबसे अधिक खतरा पहुंचने की आशंका है वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता को जन्म देता है जिसका विशिष्ट देशज संस्कृतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है सांस्कृतिक समरूपता के नाम पर पश्चिमी सं संस्कृतिक मूल्यों को अन्य आंचलिक संस्कृतियों पर लादा जा रहा है इससे खानपान रहन सहन वह जीवन शैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है वैश्वीकरण का सकारात्मक पक्ष यह भी है कि प्रौद्योगिकी के विकास में परिवार से एक नवीन विश्व संस्कृति के उदय की प्रबल संभावनाएं बन गई है इंटरनेट सोशल मीडिया फैक्स उपग्रह तथा केबल टीवी ने विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विद्यमान सांस्कृतिक वादों को हटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है
* भारत पर वैश्वीकरण के प्रभाव:
वैश्वीकरण की लहर का भारत में आगाज पिछली शताब्दी के अंत में हुआ मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास करने वाला भारत देश इस धारा से जुड़ गया है भारत में वैश्वीकरण का सूत्रपात 24 जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने किया था वह अमेरिकनमुख वैश्वीकरण के लिए कई बार आलोचना की केंद्र रहे व्यवहार में उस समय के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ही नई आर्थिक नीतियों को शुरु किया
1991 में नई आर्थिक नीति अपनाकर भारत वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया से जुड़ गया 1992 से 93 से रुपए को पूर्ण परिवर्तनीय मनाया गया पूंजी बाजार और वित्तीय सुधारों के लिए कदम उठाए गए आयात निर्यात नीति को सुधारा गया इसमें प्रतिबंधों को हटाया गया 30 दिसंबर 1994 को भारत में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता वादी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई और भारत इस पर हस्ताक्षर करके इसका सदस्य बन गया समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने अनेक नियमों और औपचारिकताओं को समाप्त करना शुरू कर दिया जो वर्षों से आर्थिक विकास में बाधक बनी हुई थी प्रशासनिक व्यवस्था में अनेक सुधार किए गए और सरकारी तंत्र की जटिलताओं को हल्का किया गया
देश में अभी भी वैश्विक परिवर्तन का दौर जारी है भारतीय राजनीति पर वैश्वीकरण के भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़े हैं इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय संघवाद की तीन अलग-अलग प्रक्रिया सामने आई है पहला ही है आशंका है कि वैश्वीकरण के कारण अर्थव्यवस्था की डील से देश के आर्थिक विकास पर विषम प्रभाव पड़ा है क्योंकि भारत अभी भी एक विकासशील देश है और यह विकास के मार्ग पर वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रवृत्तियों का लाभ लेते हुए विकसित देशों की बराबरी नहीं कर सकता वैश्वीकरण का सर्वाधिक लाभ अर्थव्यवस्थाओं को होगा जो पहले से ही विकसित है अर्ध विकसित और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए देश इस दौड़ में पीछे रह जाएंगे यदि भारतीय राज्य को संतुलित समग्र समाजवादी विकास की अभिवृद्धि करनी है तो राष्ट्रीय सरकार की शक्तियों में भी बढ़ोतरी करनी पड़ेगी इसी कारण प्रतिस्पर्धा और बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए वह सम्मान नीतियों को लागू करने के लिए केंद्रीकरण की मांग करती है
दूसरा वैश्वीकरण की परवर्ती वैधता का संकट पैदा करती है एक तरफ राष्ट्रीय राज्य अपनी आर्थिक संप्रभुता को तो कम कर देता है किंतु आंतरिक संप्रभुता का परित्याग करने सेपरेट रखता है घरेलू संप्रभुता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय राज्य को स्थानीय लोकतांत्रिक संरचनाओं की रचना करनी पड़ती है ताकि राज्य की वैधता आगे बढ़ सके
भारतीय संघवाद की तीसरी परत पंचायती राज की संवैधानिक मान्यता है इसे चिंता का प्रतिबिंब है इस पर वर्दी का नवीन स्थानीयता की संज्ञा दी जाती है


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