मीराबाई जीवन परिचय

मेड़ता के राठौड़ शासक राव रत्नसिंह की पुरी मीरा का जन्म 1498 ई . में मेड़ता पास ' बाजीली ' गाँव में हुआ तथा लालन - पालन कुड़की गाँव में हुआ । इनका पालन ऐषण इनके दादा राव दूदा ने किया । 1516 ई . में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा के ज्येष्ठ पुर भोजराज के साथ हुआ । भोजराज को आकस्मिक मृत्यु ने मीरा के जीवन को एकाकी व संघर्षमय बना दिया और वह संत सेवा व कृष्ण भक्ति में सीन हो गई । सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ के शासक विक्रमादित्य ने मीरा को कर पहुँचाए । फलतः वह चित्तौड़ का परित्याग कर वृन्दावन चली गई और वहीं चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूपगोस्वामी से दीक्षा ली । सगुण भक्ति संत मीरा में कृष्ण की भक्ति का बीजारोपण तो बचपन में हो हो गया था । मगर पति की मृत्यु के बाद इन्होंने तत्कालीन समाज को सभी रूड़ियों का त्याग कर अपने को संत संगति व कृष्ण भक्ति में निमग्न कर लिया और अंततः कृष्ण को ही अपना सर्वस्व मान लिया । ' माये तो गिरधर गोपाल , दूसरो न कोई । ' मीरा की भक्ति माधुर्य भव की थी । इनकी भक्ति की मुख्य विशेषता यह थी कि उनहोंने ज्ञान से अधिक भावना व ब्रद्धा को महत्व दिया । मीरा के अनुसार गायन , नृत्य और कृष्ण स्मरण ही भक्ति का सरत मार्ग है । मीरा ने भकित , वात्सल्य और भूगार की विगी से भजनों को प्रवाह व प्रखर रूप दिया । इन्होंने सामान्य बोलचाल की भाषा में अपने विचारों को प्रकट किया । राजस्थानी , ब्रज , गुजराती और पंजाबी भाषा में इनके द्वारा रचित पद मिलते हैं । ' सत्याभामा जी नू स्मणो ' , ' गीत गोविन्द को टीका ' , ' राग गोविन्द ' , ' मीरा री गरीबी ' , ' रुकमणी मंगल ' आदि मीरा द्वारा रचित प्रमुख रचनाएँ हैं । मीरा अपने प्रियतम कृष्ण को खोजती हुई अंतत : द्वारका चली गई । माना जाता कि गुजरात के डाकोर नामक स्थान पर स्थित रणछोड़ मंदिर में कृष्णभक्ति करते र मीरा कृष्ण में विलीन हो गई ।

संत दादूदयाल दादू पंथ

संत दादूदयाल दादू पंथ के प्रवर्तक दादू दयाल का जन्म अहमदाबाद में 1544 ई . में इनका लालन - पालन लोदीराम ब्राह्मण ने किया । संत ब्रह्मानन्द दादू के गुरु ई . में इन्होंने सांभर में धुनियाँ का कार्य शुरू किया और यहीं पर सर्वप्रथम जनसाधारण को अपने उपदेश दिए । इन्होंने हिन्दू - मुसलमानों के धार्मिक अंधति का खण्डन किया , जिससे सांभर के काजी द्वारा इन्हें प्रताड़ित भी किया गया । सीन इन्होंने अपनी विचारधारा को नहीं छोड़ा । सांभर में इनके काफी शिष्य हो गए थे । यहीं से दादूपंथ का आरंभ माना जाता है । सांभर में ही 1575 ई . में इनके पहले ही गरीबदास का जन्म हुआ । बाद में एक पुत्र मिस्किनदास और दो पुत्रियां शोभाकरी और रूपकंवरी और हुई । 1585 ई . में इन्होंने फतेहपुर सीकरी में मुगल सम्राट अाय से भेंट की । तत्पश्चात् आमेर , जयपुर , मारवाड़ आदि स्थानों में भ्रमण करते हुए कहा अपने विचारों का प्रचार किया । अंत में ये ' नरायणा ' आ गए और यहीं 160313 इनका देहांत हो गया । यही इस पंथ का प्रमुख पीठस्थल है । दादू ने ब्रह्म , जीव , जगत और मोक्ष पर अपने उपदेश सरल मित्र हिन्दी ( सधुक्याड़ी में दिए । दादू के 152 प्रधान शिष्य थे , जिसमें से 100 शिष्य एकान्तवासी थे , किंग शिष्यों ने स्थान - स्थान पर दादारों की स्थापना की । इन्हें दादू पंथ का बावन म्यान भी कहा जाता है । ' दादूजी की वाणी ' तथा ' दादरा दहा ' नामक ग्रंथों में दादू के उपदेश और विचार संगृहीत हैं । दादू कबीर की ही तरह सुधारवादी , आचरण और मेह मूल्यों को मानने वाले , परमतत्व की खोज की ओर उन्मुख थे । इसलिए इन्हें राजस्थान का कबीर ' भी कहा जाता है । दादू ने परब्रह्म को आदि गुरु माना है और राम व मला में भेद नहीं माना है । दाद ने कर्मकाण्ड , जातिप्रथा , मूर्तिपूजा , रूढ़िवादिता आदि । घोर विरोध किया । गरीबदास , मिस्किनदास , सुन्दरदास , बखनाजी , रजन , माधोधन दादू के प्रसिद्ध शिण थे ।

मारवाड़ प्रजामण्डल

मारवाड़ प्रजामण्डल मारवाड में राजनीतिक चेतना जागृत करने की शुरुआत 1920 ई . में स्थापित ने की । इसके सदस्यों ने खादी प्रचार और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार मे कार्यक्रम चलाये । मारवाड़ सेवा संघ ने मादा पशुओं की निकासी के विरुद्ध आंदोलन । जलाया । फलतः महाराजा को मादा पशुओं की निकासी पर पुनः प्रतिबंध लगाना पड़ा । 1927 ई . में जयनारायण व्यास ने ' मारवाड़ हितकारिणी सभा ' के बैनर तले राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने की माँग की तथा राज्य द्वारा समाचार पत्रों पर लगाये गये प्रतिबंध एवं जागीरदारों द्वारा किसानों पर किये जा रहे अत्याचारों की आलोचना की । फलत : 1929 ई . में व्यास और उनके सहयोगियों द्वारा अखिल भारतीय देशी राज्य
राज्य ने इन पुस्तकों कार्यकर्ताओं जयनारायण लेक परिवाना व्यास के शासन । ' लोक परिषद के जोधपुर में बुलाये जाने वाले अधिव मारवाड़ की अवस्था ' एवं ' पापावापा अत : जपनारायण व्यास पुस्तिकाएं लिखकर मारवाड़ के शासन की कट आलोचना की । राज्य नइन पर पर प्रतिबंध लगा दिया और मारवाड़ हितकारिणी सभा के प्रमुख कार्यकर्ताओंजयः व्यास , आनन्दराज सुराणा और भवरलाल सर्राफ को गिरफ्तार करके जेल भेजा मार्च , 1931 के गांधी - इविन समझौते के फलस्वरूप ये नेता जेल से रिहा , 10 मई , 1931 को जयनारायण व्यास ने ' मारवाड़ यूथ लीग ' की स्थापना इसके सदस्यों ने यादी प्रचार , विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार व शराब की दक धरना दिया तथा सरकार से उत्तरदायी शासन , नागरिक अधिकार देने की मांग जेल भेज दिया । जेल से रिहा हुए । लीग ' की स्थापना की । देने की मांग के साथ की । 24 - 25 नवम्बर को य लोक परिषद् का अधिवेशन साथ ताग - बाग एवं बेगार पर रोक लगाने की भी माग का । 24 - 25 नवर पादकरण शारदा की अध्यक्षता में पुष्कर में मारवाड़ राज्य लोक परिषद्का अनि हुआ , जिसमें कस्तूरबा , काका कालेलकर और मणिलाल कोठारी जैसे राष्ट्रीय ने भी शिरकत की । अधिवेशन में जागीरदारी अत्याचारों और राज्य की दमन नीति कर आलोचना की गई तथा उत्तरदायी शासन की स्थापना एवं नागरिक अधिकारों के में प्रस्ताव पास किए गए । 5 मार्च , 1932 को राज्य सरकार ने ' मारवाड़ दरबार पब्लिक सेफ्टी अध्यादेश जारी कर सभी प्रकार के आंदोलनों पर प्रतिबंध लगा दिया । 1934 ई . में छगनराज चौपासनी वाला , अभयमल मेहता एवं भंवरलाल साफ ने ' मारवाड़ प्रजामण्डल ' की स्थापना की और मारवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापन एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा अपना लक्ष्य घोषित किया । राज्य ने भाषण और सभ पर प्रतिबंध लगाते हुए जयनारायण व्यास को राज्य से निष्कासित कर दिया । ' कृष्ण ' मामले को लेकर प्रजामण्डल ने विरोध सभाओं का आयोजन किया । फलतः सरकार ने अगस्त , 1936 में प्रजामण्डल को अवैध घोषित कर दिया । जुलाई , 1936 में प्रजामण्डत ने राज्य द्वारा स्कूलों व कॉलेजों की फीस वृद्धि के विरोध में आंदोलन चलाया । सरकार ने फीस वृद्धि को निरस्त नहीं किया , मगर इससे जनता में जागरूकता बढ़ी । दिसम्बर 1937 में ' मारवाड़ की अवस्था ' नामक पुस्तक रखने के आरोप में छगनराज चौपाल याला और राज्य शासन के विरुद्ध प्रचार करने के अपराध में पुरुषोत्तम प्रसाद नया प्रजामण्डल को लोकप्रियता मिली । बंदी बनाकर कठोर कारावास की सजा दी गई । सरकार के इन दमनकारी कर हरिपुरा अधिवेश के पर मारवाड़ लोक परिषद - फरवरी , 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिव राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना की माँग ने जोर पकड़ा । प्रजामण्डल लगा होने से मई , 1938 में रणछोड़दास गट्टानी की अध्यक्षता में ' मारवाद की स्थापना की गई । निर्वासित जयनारायण व्यास को इसका मुख्य उद गया । लोक परिषद् ने जागीरदारी प्रथा का विरोध करते हुए उत्तरदाया करने की मांग की । 1938 ई . में श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित और सु " जोधपुर आने से जनआंदोलन को बल मिला । 1939 ई . में जयनारायण व्यार प्रजामण्डल पर प्रतिया

जयपुर प्रजामण्डल

जयपुर प्रजामण्डल राज्य में जन - जागृति का प्रथम सुव्यवस्थित प्रयास श्री अर्जुनलाल सेठी या । तत्पश्चात् जयपुर हितकारिणी सभा , आर्य समाज आदि ने भी युवाओं में राष्ट्रीय भावना उत्पन्न की । 1922 ई . में हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए ठाकुर कल्याणसिंह श्यामलाल वर्मा ने , चरखा संघ के माध्यम से जमनालाल बजाज ने भी जनजागति पैदा करने का प्रयास किया । सितम्बर , 1927 में जयपुर में भ्रष्ट शासन व नये करों के विरुद्ध प्रदर्शन हुआ । शासन द्वारा शक्ति का प्रयोग करने के बावजूद जनता की जागरूकता का दमन न हो सका । राज्य की दमन नीति का विरोध करने एवं नागरिक अधिकारों की स्थापना के लिए 1931 ई . में श्री कपूरचन्द पाटनी ने ' जयपुर प्रजामण्डल ' की स्थापना की । मगर उन्हें आवश्यक सहयोग नहीं मिला । 1937 ई . में जमनालाल बजाजी , केसों में महामण्डल का पुनर्गठन किया गया जिसका अध्यक्ष उपाध्यक्ष चिरंजीलाल मित्र , सचिव होरालाल शास्त्री और संयम , पाटनी को बनाया गया । जयपुर प्रजामण्डल ने महाराजा की छाछाया में को स्थापर नागरिक अधिकारों को स्थापना को अपना ले प्रमण्डल ने पाय सभा की स्थापना , अभिव्यक्ति की स्वतंत्र अकालयस्त क्षेत्रों में तगान वसूली न किये जाने की भी मांग की । संयुक्त सचिव कपूरचर जलाया में उत्तरदायी शाय पदा उद्देश्य घोषित किर जयपुर में जमनालाल बा संबंध में प्रस्ताव पारित अक्ति की स्वतंत्रता , लाग - बाग हारे ने की भी मांग की । 1 - 9 मई , 1935 को प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन जयपुर में जब की अध्यक्षता में हुआ , जिसमें प्रजामण्डल के उपर्युक्त उद्देश्यों के संबंध में य में निर्वासित व्यक्तियों का निवासन तुरंत रद करने की मांग की । जमण्डल की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने 30 मई 100 र नियम प्रसारित करके किसी भी गैर पंजीकृत संस्था द्वारा सभा - सम्मेलन व उसका सदस्य बनना अवैध घोषित कर दिया । सरकार ने राज्य कर्मचारियों व उससे अनि के राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया तथा सभा बजलसों पर भी रोक लगा दी । 16 दिसम्बर , 1938 को जमनालाल बजाज के जयपर प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया । 11 फरवरी , 1939 को बजाज ने राज्याज्ञा का उल्लंघन का उपपुर में प्रवेश किया । फलतः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । उसी रात्रि को होगतात शाम्बी , चिरंजीलाल , हरिशचन्द्र , कपूरचन्द्र पाटनी और हंस डी . राय को गिरफ्तार कर लिया गया । लेकिन प्रजामण्डल का सत्याग्रह समाप्त होने की जगह गति कर गया हजारों की संख्या में पुरुषों और महिलाओं ने सत्याग्रह में भाग लिया , गिरफ्तार हुए और पुलिस के अत्याचार सहे । 18 मार्च , 1939 को गांधीजी की सता पर सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया । अतः राज्य सरकार ने अगस्त , 1939 को सभा सपाहियों को बेलों से मुक्त कर प्रजामण्डल को मान्यता प्रदान कर दी । 25 मई , 1949 को प्रजामण्डल के अधिवेशन में जमनालाल बजाज ने उत्तरदा शासन स्थापित करने की मांग को पुनः दोहराया तथा शेखावाटी के किसान सखावाटी के किसान आंदोलन मण्डल के तीसरे अधिवेशन में दाइसी मध्य प्रजामण्डल कार्यकारिणी से मार साल दल ' का गठन कर लिया । आ . को समर्थन दिया । नवम्बर , 1941 में सीकर में प्रजामण्डल के तीसरे आप उत्तरदायी शासन की मांग पुनः उठाई गई । इसी मध्य प्रजामण्डल कार्यका होने पर विरंजीलाल ने ' प्रजामण्डल प्रगतिशील दल ' का गठन प्रजामण्डल कुछ कमजोर हुआ । अत : सरकार ने प्रजामण्डल की मागा दी । फरवरी , 1942 में श्री बजाज के देहांत से भी प्रजामण्डल का अगस्त , 1942 के ' भारत होने आंदोलन ' के दौरान प्रजामण्डल उत्तरदायी शासन स्थापित करने की मांग की । जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री ने हीरालाल शास्त्री को पत्र लिखकर राज्य में शीघ्र ही उत्तरदायी शासन का आश्वासन दिया । अत : प्रजामण्डल ने आंदोलन नहीं छेड़ा । बाम रामकरण जोशी , दौलतमल भण्डारी और हंस दी . - मण्डल की मांगों की उपेक्षा कर प्रजामण्डल को धक्का लगा । रान प्रजामण्डल ने महाराजा के व के प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माईत दायी शासन स्थापित कर छड़ा ।

मेवाड़ प्रजामण्डल

 मेवाड़ प्रजामण्डल लिया किसान आन्दोलन ने किसानों के साथ - साथ मेवाड़ राज्य की सम्पूर्ण जागति उत्पन्न कर दी । जनता नागरिक अधिकारों एवं शोषण के खिलाफ कि होकर राज्य की नीतियों का विरोध करने लगी । 1932 से 1938 ई . तक कार्य एवं अनियमित करों की वसूली के विरोध में उदयपुर में प्रदर्शन हुए . मगर शेग्य नेतृत्व के अभाव में ये प्रदर्शन अपने उद्देश्य की परिणति तक न पहुँच सके । राज्य दारा विरोध को शक्ति से दबाने के बावजूद लोग अभिव्यक्ति एवं सभा - सम्मेलन करने की आजादी देने की मांग पर अड़े रहे । कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में रियासतों के राजनैतिक संगठनों को समर्थन देने का प्रस्ताव पारित होते ही माणिक्यलाल वर्मा , ओ भीलों के मध्य रचनात्मक कार्य में मलान थे , ने मेवाड राज्य का दौरा कर राजनैतिक संगठनों की पृष्ठभूमि तैयार की ।
उन्होंने उदयपुर पहुंच कर अपने साथियों से विचार - 14 . को बलवन्तसिंह मेहता के निवास पर मेवाड़ प्रजामण्डल ' की स्थापना मेहता को प्रजामण्डल का अध्यक्ष , भूरलाल बया को उपाध्यक्ष और महामंत्री बनाये गये । तीन दिन में उदयपुर शहर में प्रजामण्डल बनने से मेवाड़ सरकार चिन्तित हो गई और उसने माणिक्य लाल की स्थापना की स्वीकृति लेने का आदेश दिया । लेकिन वर्मा ने दो फलतः । । मई , 1938 को राज्य ने प्रजामण्डल को गैरकानूनी घोषित कर भाषणों और समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा माणिक्य लाल की व्यास को मेवाड़ छोड़ने के आदेश दिए । अवैध सपना की । बलब और माणिक्यलाल मण्डल के दो हजार से लाल वर्मा को प्रदान मी ने इससे इन्कार कर दिया घोषित करते हुए सभः लाल वर्मा और रमेशवर भगवा 1944 आदेश प्राप्त कर अ की अ 31 दि अध्यक्ष माणिक्य लाल वर्मा वर्धा पहुंचे और वहां से गांधीजी का आदेश पालन में प्रजामण्डल का अस्थायी कार्यालय स्थापित किया । अजमेर से वर्मा ने वर्तमान शासन ' नामक पुस्तिका प्रकाशित की जिसमें मेवाड़ राज्य के शासन आलोचना की गई । सरकार ने प्रजामण्डल की आवाज को दबाने के उद्देश्य से प्रेमनार माथुर को राज्य से निष्कासित कर दिया । 30 सितम्बर को प्रजामण्डल के उपमा भूरेलाल बया को गिरफ्तार कर लिया । फलतः प्रजामण्डल ने विजयादशमी से सत्याना शुरू करने की घोषणा की , मगर इससे पूर्व राज्य सरकार ने बलवन्त सिंह मेहता । रमेशचन्द्र व्यास सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया और कई मेवा से निष्कासित कर दिये गए । राज्य सरकार की इस दमनात्मक कार्यवाही के विशेष में उदयपुर , भीलवाड़ा , चित्तौड़ , जहाजपुर , नाथद्वारा आदि स्थानों पर सभाएं हुई । नाथदरा । में महिलाओं ने भी आन्दोलन में भाग लिया और जेल गईं । 2 फरवरी , 1939 को माणिक्य लाल वर्मा को देवली से गिरफ्तार कर अमानुषिक यातनाएं दी गई । उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर दो वर्ष की सजा दी गदार में स्वास्थ्य खराब होने पर 8 जनवरी , 1940 को उन्हें मक्त कर दिया गया । की सलाह पर प्रजामण्डल ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया । 22 फरवरी , 1947 में उत्त मेवाड़ कार्यका से युक्त नहीं वि जिसे 2 सरकार कोठारी चुनाव । महाराणा गोली से प्रश्न ह 1 22 फरवरी , 1941 को राज्य जामण्डल ने नागरिक अधिका कार्य जारी रखा । 25 - 3 माणिक्य लाल वर्मा किया । अधिवेशन में गन्न जयपुर ने किया न पूरे राज्य में शयर का कम करने के लि पाली व्यवस्थापिका भावना एवं श्या सरकार ने प्रजामण्डल पर लगा प्रतिबंध हय दिया । प्रजामण्डल ने नागार एवं उत्तरदायी शासन को स्थापना के लिये जनजागृति का कार्य जारी नवम्बर , 1941 को मेवाड़ प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन माणिक्या सभापतित्व में हुआ , जिसका उद्घाटन आचार्य कपलानी ने किया । आप में उत्तरदायी शासन स्थापित करने की मांग की गई । प्रजामण्डल ने पूर खोलकर जनजागृति का प्रयास किया । प्रजामण्डल के प्रभाव को कम मेवाड़ सरकार ने जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के बहमत वाली स्थापित करने की घोषणा की । अगस्त , 1942 में ' भारत छोड़ो ' आन्दोलन के दौरान प्रजामण्डल का साथ छोड़ो ' नारा दिया ।

मेहरानगढ़ का किला

मेहरानगढ़ का किला , जोधपुर मेहरानगढ़ के किले का निर्माता जोधपुर नगर का संस्थापक 1489 ई . ) था । राव जोधा ने 13 मई , 1459 को चिड़ियाट्रक ना चिड़ियानाथ के नाम पर , जिनका स्थान आज भी किले के पीछे विता की नींव रखी । ऐसी मान्यता है कि किले की नीव में राजिया नामक दफन किया गया । मयूराकृति का होने के कारण जोधपुर के किले को भी कहा जाता है राव जोधा ने इस किले के चारों ओर एक नगर बसायी जो उनके नाम पर जोधपुर कहलाया । राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों में सबसे किला अपनी विशालता के कारण ' मेहरानगढ़ ' कहलाया । के पीछे विद्यमान है ) पर किन या नामक व्यक्ति को जित के किले को ' मयूरध्वज गव ' और एक नगर बसाया ( 14598 । तीय दर्गों में सबसे प्रमुख , यह माधोप बीच और व के संब किला जमीन दुर्गम मेहरानगढ़ किला भूमितल से लगभग 400 फीट ऊँचा है । किले के चारों को मुद परकोटा है जो लगभग 20 फीट से 120 फीट तक ऊँचा और 12 से 20 फीट तक चौड़ा है । किले की लम्बाई 500 और चौड़ाई 250 गज है । इसकी प्राचीर में विशाल बुर्जे बनी हुई हैं । मेहरानगढ़ के दो बाह्य प्रवेशद्वार हैं - उत्तर - पूर्व में जयपोल तथा दक्षिण - पश्चिम में फतेहपोल । ध्रुवपोल , सूरजपोल , इमरतपोल , भैरोंपोल आदि म प्रवेश द्वार हैं । 1544 ई . में इस किले पर शेरशाह सूरी ने अधिकार कर लिया था । लेकिन 1545 ई . में मालदेव ने पुनः इसे अपने आधिपत्य में ले लिया । 1565 ई . में मुगल सूबेदार हसन कुली खाँ ने चन्द्रसेन का आधिपत्य समाप्त कर इस पर मुगल आधिपत्य से स्थापना की । मुगल आधिपत्य स्वीकार करने पर मोटा राजा उदयसिंह को 1582 जागीर के रूप में दे दिया गया । 1678 ई . में औरंगजेब ने इसे मुगल राज्य में मिला 1707 ई . में औरंगजेब की मृत्यु होने पर अजीतसिंह ने मुगल सूबेदार जफर कुता से इसे छीन लिया । तब से ये राठौड़े का निवास स्थान रहा है । ब्रिटिश सा रूडयार्ड किपलिंग ने एक लंबा समय इस किले में बिताया । उसने इ " देवताओं परियों और फरिश्तों द्वारा निर्मित माना है । " लाल पत्थरा सनगद स्थापत्य कला की दृष्टि से बेजोड है । महाराजा सूरसिह मातामहत सुनहरी अलंकरण के लिए प्रसिद्ध है । इसकी छत व दाव महाराजा तस्तसिंह की देन है । अभयसिंह द्वारा निर्मित फूलमा लिए प्रसिद्ध है । तख्त विलास , अजीत विलास , उम्मद आदि का भीतरी वैभव दर्शनीय है । महलों में नक्काशी , मेहराबों , झ ॥ हरत में डालने वाली है । चोखेलाव महल , विचला महल , महा घाटी में नीचे है । हो गया बताया । उसने इस किले को लाल पत्थरों से निर्मित सूरसिंह द्वारा मिति तव दीवारों पर सोने का पौलिक का कार्य महाराजा तरतसिंह को दन हा पर बारीक खुद के लिए प्रसिद्ध है । तखत विलास , में रणथा उसने का है । ती , मेहराबों , झरोखों और

भरतपुर प्रजामण्डल

भरतपुर प्रजामण्डल भरतपुर में जन चेतना जागृति का श्रेय ' आर्य समाज ' को है । 1920 ई . तक भरतपुर , डीग , कुम्हेर , भुसावर , नगर , बयाना , वल्लभगढ़ इत्यादि में आर्य समाज की शाखाओं और मंदिरों की स्थापना हो चुकी थी । जगन्नाथ अधिकारी ने भी ' हिन्दी साहित्य समिति 1012 ई . और ' वैभव ' नामक पत्र के द्वारा जनजागृति का कार्य किया । फलतः उसे दोह के आरोप में जेल जाना पड़ा । किसानों की मांगों को लेकर देशराज ने 1924 107 ई . तक अनेक सभाएँ की और किसानों की मांगों से सरकार को अवगत कराया , मगर सरकार उदासीन बनी रही । 1927 ई . में महाराजा कृष्णसिंह द्वारा उत्तरदायी शासन स्थापित करने की घोषणा करने पर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पदच्युत करके डंकन मैकेन्जी को शासन संबंधी अधिकार साँप दिये । मैकेन्जी ने सभाओं , जुलूसों और नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया । मैकेन्जी की नीतियों के विरोध में नवम्बर , 1928 में ' भरतपुर राज्य प्रजा संघ ' की स्थापना की गई । गोपीलाल यादव को इसका अध्यक्ष और देशराज को सचिव बनाया गया । प्रजा संघ ने राजपूताना प्रांतीय देशी राज्य परिषद् का अधिवेश भरतपुर में करवाने की योजना बनाई तो प्रजा संघ के सचिव देशराज को गिरफ्तार कर लिया गया । जनता ने दीवान को हटाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया । 1930 - 31 ई . में भरतपुर । में छात्रों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया । सरकार ने पुलिस कार्यवाही द्वारा आंदोलन को दबाने का प्रयास किया । पं . नेहरू की प्रेरणा से 1937 ई . में भरतपुर में कांग्रेस मण्डल की स्थापना हुई । माच , 1938 में रेवाड़ी में ' भरतपुर राज्य प्रजामण्डल ' की स्थापना हुई , गोपीलाल यादव प्रजामण्डल का अध्यक्ष , ठाकर देशराज व रेवतीशरण उपाध्याय को उपाध्यक्ष बनाया गया । प्रजामण्डल ने पंजीकरण के लिए सरकार को आवेदन दिया , मगर सरकार ने माकरण से इनकार करते हुए इसे अवैध घोषित कर दिया । प्रजामण्डल ने भाषण व पर प्रतिबंध हटाने व उत्तरदायी शासन स्थापित करने की मांग करते हुए 21 अप्रैल , सत्याग्रह शुरू कर दिया । प्रजामण्डल ने किसानों को लगान नहीं चुकाने की का । प्रजामण्डल के नेताओं की गिरफ्तारियों व दमन के बावजूद जब आंदोलन वा राज्य ने 23 दिसम्बर , 1940 को प्रजामण्डल से समझौता कर लिया । वक बदियों को रिहा करते हए प्रजामण्डल का प्रजा परिषद् के नाम से या गया तथा भाषण , लेखन और सभाओं पर से प्रतिबंध हटा दिया । बर , 1940 से । जनवरी , 1941 तक प्रजा परिषद् का प्रथम राजनीतिक मजयनारायण व्यास की अध्यक्षता में हुआ । सम्मेलन में उत्तरदायी ना की मांग दोहराई गई128 से 30 दिसम्बर , 1941 काम एकदमा था राज्य ना पड़ा । जैसलमेर जा परिषद दिया गया दिया गया । गरमल गोपा 1939 को सत्याग्रह शुरू कर दिया में ' जैसलमेर भी अपील की । प्रजाम व गोपाको वक अत्याचार हिस का संचार कई कार्यकारी सलमेर में एक अक्र बर , 100 जिस पर पुलिस सभी राजनीतिक दिया पंजीकरण किया गया तथा 30 दिसम्बर , 1940 से । सध्यालेन भातपुर में जप शासन स्थापना काम

संस्कृति , परम्परा एवं विरासत

राजस्थान का इतिहास , संस्कृति , परम्परा एवं विरासत लिया । भंवरलाल कवि से तथा कल्याणदास करौली प्रजामण्डल करौली में रचनात्मक कार्यों द्वारा जनजागृति का शुरुआत ठाकुर पूर्णसिंह मदनसिंह ने की । मदनसिंह ने सुअर मारने पर प्रतिबंध हटाने , प्रशासन प्रयोग व बेगार समाप्ति की मांग को लेकर अपनी पत्नी के साथ अनशन कि के दबाव के कारण शासन ने इनकी मांगों को स्वीकार कर लिया । ने खादी प्रचार द्वारा , चिरंजीलाल ने हरिजनोद्धार के माध्यम से तथा कल रामगोपाल ने बेगार विरोधी आंदोलन एवं समाचार पत्रों के माध्यम से करौली में चेतना और जन - जागृति पैदा करने का कार्य किया । 1938 ई . में त्रिलोकचन्द माथुर ने अपने साथियों के साथ करौली प्रजाम स्थापना की । प्रजामण्डल ने जनता की सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक दशा का लक्ष्य रखा । प्रारंभ में इसने उत्तरदायी शासन की मांग भी नहीं की । फिर भी सरकार द्वारा प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसाकर परेशान किया गया अप्रैल , 1939 में करौली में प्रजामण्डल के अधिवेशन में प्रशासनिक सुधारों की मांग की गई । प्रजामण्डल ने बंजर भूमि पर लगान नहीं लेने , बेगार समाप्त करने , किसने को ऋण देने के लिए सरकारी समितियों की स्थापना करने तथा स्थानीय स्वशासन स्थापित करने की भी मांग की । राज्य ने प्रजामण्डल की मांगों पर ध्यान देने के बजाय इससे जुड़े लोगों को उत्पीड़ित किया । ' भारत छोड़ो ' आंदोलन के दौरान प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनों और भाषा के द्वारा आंदोलन को गतिशील रखा । सरकार ने प्रजामण्डल के कई कार्यकतोआ के बना लिया । नवम्बर , 1946 में राजपूताना के राज्यों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सम्मेलन करौली में हुआ , जिसमें पहली बार करौली में उत्तरदायी शासन स्थ मांग की गई । प्रजामण्डल ने राशन पद्धति की बुराइयों और दमनकारी का में सभाएं की और जुलूस निकाले । फलतः राज्य ने जुलाई , 1947 में से के लिए एक समिति नियुक्त की , लेकिन इसमें प्रजामण्डल के ए . र दमनकारी कानूनों के विरोध तुलाई , 1947 में संवैधानिक सुधार जामण्डल के एक भी सदस्य के : को करौली के ' मन उत्तन सम्मिलित नहीं करने से आंदोलन चलता रहा । 18 मार्च , 19 संघ ' में विलय तक उत्तरदायी शासन स्थापित करने की दिशा म करने की दिशा में कदम नहीं उठाया चार सुधारिणी स घौलपुर प्रजामण्डल 11910 ई . में ज्वाला प्रसाद और यमुना प्रसाद ने और 1911 ई . में ' आर्य समाज ' के माध्यम से जन चेतना 1918 ई . में स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्य समाज ने फलतः आर्य समाज के कई कार्यता माध्यम से जन चेतना जागृत करने के समाज ने स्वशासन आंदोलन

जयपुर प्रजामण्डल

जयपुर प्रजामण्डल जयपर राज्य में जन - जागृति का प्रथम सुव्यवस्थित प्रयास श्री अर्जुनलाल सेठी किया । तत्पश्चात् जयपुर हितकारिणी सभा , आर्य समाज आदि ने भी युवाओं में राष्ट्रीय बना उत्पन्न की । 1922 ई . में हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए ठाकुर कल्याणसिंह व श्यामलाल वर्मा ने , चरखा संघ के माध्यम से जमनालाल बजाज ने भी जनजागृति पैदा करने का प्रयास किया । सितम्बर , 1927 में जयपुर में भ्रष्ट शासन व नये करों के विरुद्ध प्रदर्शन हुआ । शासन द्वारा शक्ति का प्रयोग करने के बावजूद जनता की जागरूकता का दमन न हो सका । राज्य की दमन नीति का विरोध करने एवं नागरिक अधिकारों की स्थापना के लिए 1931 ई . में श्री कपूरचन्द पाटनी ने ' जयपुर प्रजामण्डल ' की स्थापना की । मगर उन्हेंआवश्यक सहयोग नहीं मिला । 19375 . 4 ॥ के प्रयासों से प्रजामण्डल का पुनर्गठन किया गया जिसका अध्यक्ष उपाध्यक्ष चिरंजीलाल मिा , सचिव हीरालाल शास्था और संयुक्त राम पानी को बनाया गया । जयपुर प्रजामण्डल ने महाराजा की छाछाया में की की स्थापना एवं नागरिक अधिकारों की स्थापना को अपना उदेश , प्रजामण्डल ने धारा सभा की स्थापना , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , लाग : अकालगस्त क्षेत्रों में लगान वसूली न किये जाने की भी मांग की । 8 - 9 मई , 1918 को प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन जयपुर में जमनालाल ने अ लाया में उत्तरदायी शासन ना उद्देश्य घोषित किया । तंत्रता , लाग - बाग हटाने व की चलान करने करें , आंदो सरका विरोध को अध्यक्षता में हुआ , जिसमें प्रजामण्डल के उपर्युक्त उद्देश्यों के संबंध में प्रस्ताव पारि करते हुए राज्य से निर्वासित व्यक्तियों का निर्वासन तुरंत रद्द करने की मांग की गई प्रजामण्डत की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने 30 मई , 1938 को एक नियम प्रसारित करके किसी भी गैर पंजीकृत संस्था द्वारा सभा - सम्मेलन करना व उसका सदस्य बाना अवैध घोषित कर दिया । सरकार ने राज्य कर्मचारियों व उनके आश्रितों के राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया तथा सभाओं व जुलूसों पर भी रोक लगा दी । 16 दिसम्बर , 1938 को जमनालाल बजाज के जयपुर प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया । फरवरी , 1939 को बजाज ने राज्याज्ञा का उल्लघन कर जयपुर में प्रवेश किया । फलतः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । उसी रात्रि का होगलाल शास्त्रो , चिरंजीलाल , हरिशचन्द्र , कपुरचन्द्र पाटनी और हंस डी . राय का लोक कहा । नहीं - 1939 को गांधीजी की सलाह गिरफ्तार कर लिया गया । लेकिन प्रजामण्डल का सत्याग्रह समाप्त होने की जगह मात पकड़ गया । हजारों की संख्या में पुरुषों और महिलाओं ने सत्याग्रह में भाग लिया । गिरफ्तार हुए और पुलिस के अत्याचार सहे । मार्च 1910 को गांधीजी का सत पर सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया । अतः राज्य माकाने अगस्त , 1939 क सत्याग्रहिया कोला से मुक्त कर प्रजामण्डल को मान्यता प्रदान कर दा और 25 मई , 1910 को प्रजामण्डल के अधिवेशन में जमनालाल बजा शासन स्थापित कारको मांग को पुनः दोहराया तथा शेखावाटी के किसा को समर्थन दिया । नवम्बर , 1941 में सीकर में प्रजामण्डल के तीसरे नादायी शासन की मांग पुनः उठाई गई । इसी मध्य प्रजामण्डल कार्यक ने पर चिरंजीलाल ने ' प्रभामण्डल प्रगतिशील दल ' का गठनक जामण्डल कुछ कमाएमा अत : सरकार ने प्रजामण्डल की मांगा भी प्रजामण्डल को एक मजमनालाल बजाज ने उत्तरदायी बावाटी के किसान आंदोलन क तीसरे अधिवेशन में प्रजामण्डल कार्यकारिणी से मतभेद के सदन कार्यरत मारवाद दल ' का गठन कर लिया । अत : मण्डल की मांगों की उपेक्षा कर हीरालाल शारी ल को धक्का लगा । पन प्रजामण्डल महाराजा स जैसे का काकाकी . 1942 मीनार के देहांत अगस्त , 1 . 2 करत होतो आंदोलन के दौरान प्रजामण्डल सादापोरालयकोको भोग कीजियपाशाजधानमंत्री मिज पालमा राज्य शोधही उत्तरदायी शासन स्था आप्रवासन दिया . ममपहल आंदोलन नहीं लेना बाम mon और रंगटी राय जो प्रजामण्डल नमत्री मिर्जा इस्माईल सन स्थापित करने छड़ा ।

राजस्थान में वेडिंग

1.राजस्थान में वेडिंग के लिए अच्छी और खूबसूरत जगह हम बताते हैं आपको
 मैं राजस्थान से रहने वाला हूं यहां बहुत सारी खूबसूरत जगह है जहां पर हम वेडिंग को और भी खूबसूरत बना सकते हैं इंडिया का एकमात्र जगे राजस्थान है जो दुनिया भर में प्रसिद्ध माना जाता है अगर आप शादी का प्लान  बना रहे हैं तो तो राजस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है यहां पर लोग भी विदेशों से चल कर राजस्थान के अंदर बहुत सारी जगह है अक्सर लोग यहां पर आकर धूमधाम से शादी जशन का लुफ्त उठाते हैं और यहां पर काफी प्राचीन काल से यह परंपरा देखने को मिली है अब हम आपको बताते हैं की यहां पर कौन-कौन सी जगह है जहां पर शादी को और भी खूबसूरत बना बनाया जा सकता है

2. राजस्थान का एकमात्र जगह उदयपुर.
 यह वह जगह है जहां हर कोई चाहता है कि मेरी शादी उदयपुर में हो क्योंकि यहां वह सारी सुविधाएं देखने को मिलती है और यहां पर बहुत ही खूबसूरती और हरियाली देखने को मिलती है यहां बहुत बड़े इवेंट्स भी रहते हैं जो शादी की प्लानिंग को और भी सरल तरीके से बहुत ज्यादा खूबसूरत बनाते हैं यहां पर बहुत सारी होटल रिसोर्ट जो बहुत ही पहाड़ियों से घिरी हुई है और यहां पानी का नजारा जहां पर शादी को बहुत ही और भी खूबसूरती देखने को मिलती है यहां बहुत सारी सेलिब्रेट बॉलीवुड के हीरो वगैरा ज्यादातर यह जगह ज्यादा पसंद करते हैं

 3.पुष्कर इवेंट राजस्थान.
 यह वह जगह है जो कि अजमेर जिले के पुष्कर जो पूरे विश्व के अंदर विख्यात रूप से प्रसिद्ध माना जाता है और यहां पर बहुत सारे सेलिब्रेट और शादियां बहुत सारी शादियां होती है यहां पर लोग विदेशों से लेकर भारत के अलग-अलग राज्यों से आकर यहां पर शादी का मैनेजमेंट करते हैं यह भी एक प्रसिद्ध जगह है हर कोई यहां आकर अपनी शादी की प्लानिंग करता है और यहां आकर शादी करते हैं यहां पर बहुत पहाड़िया झरने होटल वगैरा रिसोर्ट गार्डन और अच्छे इन्वेंटर और सारी सुविधाएं पुष्कर शहर में मिल सकती है यहां पर भी बॉलीवुड की बहुत सारी हस्तियां यहां आकर सेलिब्रेट करते हैं

4. जोधपुर राजस्थान.
 राजस्थान का एकमात्र बहुत बड़ा शहर है और राजस्थान का दूसरा बड़ा शहर है यहां पर भारत के राज्यों से बड़े-बड़े शहरों से विदेशों से लोग इस जगह को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं और यहां आकर शादी को सेलिब्रेट करते हैं और यहां पर बहुत सारी बहुत बड़ी-बड़ी बॉलीवुड हस्तियां यहां आकर शादी की सेलिब्रेशन और साथी ही  वेडिंग को ज्यादा पसंद करते हैं इसलिए यहां के बड़े-बड़े रिसोर्ट प्लेस यहां का सबसे बड़ा प्लेस उमेद पैलेस है जो बहुत ज्यादा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है यह भी बहुत अच्छी जगह है शादी के लिए.

5. जयपुर राजस्थान.
 राजस्थान की राजधानी जयपुर जो कि महानगर के रूप में जाना जाता है इसे गुलाबी नगरी भी कहते हैं पूरे विश्व के अंदर भारत के अंदर बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है यहां पर बहुत सारी खूबसूरत जगह शादी के लिए लोग बाहर से आकर जयपुर को एक अच्छी जगह मानते हैं यहां पर हर साल बहुत बड़ी बड़ी शादियां होती है यहां पर भारत के सभी राज्यों से चल कर यहां शादी की इवेंट की प्लानिंग करते हैं बॉलीवुड और हॉलीवुड के सेलिब्रेशन भी बहुत सारे होते हैं वेंडिंग प्लेस रिसोर्ट गार्डन होटल बड़े-बड़े महल है  जिसमें बहुत सारी शादियां होती है जयपुर यह एक शादी के लिए महत्वपूर्ण जगह है

भारत का स्वरूप

 भौतिक स्वरूप में काफी विविधता मिलती है। देश में लगभग 10.6 प्रतिशत क्षेत्र पर पर्वत, 18.5 प्रतिशत क्षेत्र पर पहाड़ीयां, 27.7 प्रतिशत पर पठार और 43.2 प्रतिशत क्षेत्र पर विस्तृत मैदान है।
भारत को 4 प्रमुख भू आकृतिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है।
उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र
उत्तर भारत का विशाल मैदान
प्रायद्वीपीय पठारी भाग
तटीय मैदान एवं द्वीप समुह

1. उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र
यह पर्वतीय क्षेत्र पश्चिम में जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्व में उरूणाचल प्रदेश तक(2500 किमी.) में फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई पूर्व की अपेक्षा(2000 किमी.) पश्चिम में (500 किमी.) ज्यादा है। यह नवीन मोड़दार पर्वत माला है इसका आकार तलवार की भांती है। इसका कारण है पश्चिमी अपेक्षा पूर्व में दबाव-बल का अधिक होना। हिमालय की स्थिती देश के ऊपरी सीमांन्त के सहारे सिंन्धु नदी से ब्रह्मपुत्र नदी तक फैली हुई है।
हिमालय पर्वत का निर्माण यूरोशियाई प्लेट(अगारा) और इंडिक प्लेट(गोडवाना) के टकराने से हुआ है। प्लेट-विवर्तनिकी सिंद्धान्त के पहले यह माना रहा था कि हिमालय की उत्पत्ति टेथीस सागर में जमें मलबों में दबाव पड़ने से हुआ है। अतः हम टेथीस सागर को ‘हिमालय का गर्भ-गृह’ कहते हैं। यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा प्रदेश है प्रथम अंटार्कटिका व द्वितीय आर्कटिक प्रदेश है।
उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को चार भागों में बांटा जा सकता है।
ट्रास हिमालय क्षेत्र
वृहद हिमालय या आंतरिक हिमालय श्रेणी
लघु या मध्य हिमालय श्रेणी
उप हिमालय या बाह्य हिमालय या शिवालिक श्रेणी
1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र
ट्रांस हिमालय को ‘तिब्बती हिमालय’ या ‘टेथीस हिमालय’ भी कहा जाता है इसकी लम्बाई 965 किमी.(लगभग) चौड़ाई 40 से 225 किमी.(लगभग) है। इस श्रेणी की औसत ऊंचाई 3100 से 3700 मी. तक है। इस श्रेणी पर वनस्पति का अभाव पाया जाता है। इसके अन्तर्गत काराकोरम, कैलाश, जास्कर एवं लद्दाख आदि पर्वत श्रेणियां आति हैं। ट्रांस हिमालय अवसादी चट्टानों का बना है यह श्रेणी सतलज सिंधु व ब्रह्मपूत्र(सांगपो) जैसी पूर्ववर्ती नदियों को जन्म देती है।
K2 या गाडविन आस्टिन(8611 मि.) भारत की सबसे सर्वोच्च चोटी है जो काराकोरम श्रेणी की सर्वोच्च चोटी है।
ट्रांस हिमालय, वृहद हिमालयों से इंडो-सांगपो शचर जोन के द्वारा अलग होती है।
2. वृहद हिमालय
इसे हिमालय या सर्वोच्च हिमालय की भी संज्ञा प्रदान की गई है। इस श्रेणी की औसत ऊंचाई 6100 मी., लंम्बाई 2500 किमी. और चौड़ाई 25 किमी. है। यह पश्चिम में नगा पर्वत से पूर्व में नामचा बर्बा पर्वत तक फैला है। इसी श्रेणी में विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटिंया पायी जाती है। जिनमें प्रमुख है - माउण्ट एवरेस्ट(8848 मी.), कंचनजंगा(8598 मी.), मकालू(8481मी.), धौलागिरी(8172मी.), नगा पर्वत(8126 मी.), अन्नपूर्णा(8048 मी.), नंदा देवी(7817 मी.), नामचबरवा(7756 मी.) आदि। यह उत्तर में सिन्धु नदी के मोड से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक है। सिन्धु, सतलज, दिहांग, गंगा, यमुना तथा इनकी सहायक नदियों की घाटियां इसी श्रेणी में स्थित है।
वृहद हिमालय में पूर्व की तुलना में पश्चिमी भाग में हिम रेखा की ऊंचाई अधिक है। अर्थात पूर्वी भाग में पश्चिमी भाग की अपेक्षा अधिक निचले भाग तक बर्फ देखी जा सकती है।
माउण्ट एवरेस्ट को नेपाल में सागरमाथा भी कहा जाता है। माउण्ट एवरेस्ट का नामकरण 1865 में भारत के महासर्वेक्षक जार्ज एवरेस्ट के नाम पर किया गया।
एवरेस्ट चोटी को पहले तिब्बती भाषा में चोमोलुगंमा कहते थे। जिसका अर्थ है ‘पर्वतों की रानी’।
इस श्रेणी में कई दर्रे भी मिलते हैं जिनमें प्रमुख हैं - जोजिला, बुर्जिल, बारा लाचा, शिपकीला, नीति, लिपकीला, नीति, लिपूलेख, नाथूला, जेलेप ला आदि। इस श्रेणी में गंगा एवं यमुना नदियों का उदगम स्थल भी है। इस श्रेणी में गंगोत्री हिमनद(उत्तराखण्ड), मिलाप एवं जम्मू हिमनद आदि प्रमुख हैं।
वृहद हिमालय, लघु हिमालय से मेन सेंट्रल थ्रस्ट के द्वारा अलग होती है।

3. लघु हिमालय
यह श्रेणी महान हिमालय के दक्षिण तथा शिवालिक हिमालय के उत्तर में स्थित है। इसकी चौड़ाई 80 से 100 किमी. तथा औसत ऊंचाई 1800 से 300 मी. है। अधिकतम ऊंचाई 4500 मी. तक पायी गयी है। पीर पंजाल श्रेणी इसका पश्चिमी विस्तार है। लघु हिमालय की सबसे प्रमुख एवं लम्बी श्रेणी पीरपंजाल श्रेणी है। पीरपंजाल श्रेणी झेलम और व्यास नदियों के बीच फैली है। इस श्रेणी में पीर पंजाल(3494 मी.) और बनिहाल(2832 मी.) दो प्रमुख दर्रे हैं। बनिहाल दर्रे से होकर जम्मू कश्मीर मार्ग जाता है। लघु हिमालय अपने स्वास्थवर्धक पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है इसके अन्तर्गत चकरौता, मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा, दार्जिलिंग एवं इल्हौजी नगर आते हैं। जिनकी ऊंचाई 1500 से 2000 मी. के बीच पाई जाती है। इस श्रेणी के ढालों पर मिलने वाले छोटे-छोटे घास के मैदानों का जम्मू-कश्मीर में मर्ग(जैसे - गुलमर्ग, सोनमर्ग, टनमर्ग) और उत्तराखंड में वुग्पाल और पयार कहते हैं।लघु हिमालय शिवालिक से मेन बाउंड्री फाल्ट के द्वारा अलग होती है।
4. उप हिमालय या शिवालिक श्रेणी
यह श्रेणी लघु हिमालय के दक्षिण में स्थित है इसका विस्तार पश्चिम में पाकिस्तान(पंजाब) के पोटवार बेसिन से पूर्व में कोसी नदी तक है। इसकी औसत ऊंचाई 600 से 1500 मी. के बीच है तथा चौड़ाई 10 से 50 किमी. तक है। शिवालिक को लघु हिमालय से अलग करने वाली घाटियों को पश्चिम में दून(जैसे - देहरादून) व पूरब में द्वार(जैसे - हरिद्वार) कहते हैं। यह हिमालय पर्वत का सबसे नवीन भाग है। शिवालिक श्रेणीयां मायो-प्लीस्टोसीन बालू कंकड तथा कांग्लोमेरिट शैल की मोटी परतों से बनी है।
श्विालिक को जम्मू-कश्मीर में जम्मू पहाडि़यां तथा अरूणाचल प्रदेश में डफला, मिरी, अवोर और प्रिशमी की पहाडि़यों के नाम से जाना जाता है।
शिवालिक के निचले भाग को तराई कहते हैं यह दलदली और वनाच्छादित प्रदेश हैं। तराई से सटे दक्षिणी भाग में ग्रेट बाउंडरी फाल्ट मिलता है जो कश्मीर से असम तक विस्तृत है।
नदियों के द्वारा हिमालय क्षेत्र को प्रमुख 4 प्राकृतिक भागों में बांटा गया है।
कश्मीर या पंजाब हिमालय - सिन्धु और सतलज नदियों के बीच फैला हुआ है। यहां हिमालय की चौड़ाई सर्वाधिक होती है। यह लगभग 560 किमी. की दुरी में फैला हुआ है।
कुमायंू हिमालय - यह सतलज एवं काली नदियों के बीच फैला हुआ है। यह लगभग उत्तराखण्ड क्षेत्र में वितृत है।
नेपाल हिमालय - यह काली एवं तिस्ता नदियों के बीच फैला हुआ है यहां हिमालय की चौड़ाई अत्यंत कम है परन्तु हिमालय के सर्वोच्च शिखर एवरेस्ट, कंचनजंगा, मकालू आदि मिलते हैं। यह हिमालय का सबसे लम्बा एवं सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्रादेशिक विभाग है।
असम हिमालय - यह तिस्ता एवं दिहांग(ब्रह्मपुत्र) नदियों के बीच फैला हुआ है

ग्रंथियां

 पीयूष ग्रंथि
यह पश्च मस्तिष्क में पाई जाती है तथा मटर के दाने जैसी एक गहरी लाल रंग की होती है इसमें मटर ग्रंथि भी कहते हैं क्योंकि यह शरीर के अन्य ग्रंथियों में नियंत्रण का कार्य करती है पीयूष ग्रंथि के दो भागों में बांटा जाता है अगर भाग और पश्चिमी भाग प्रथम अगर भाग्य बारे में पड़ेंगे अगर भाग एडेनौहाइपोफिसिस अगर बागे डीनो हाइपोफिसिस हार्मोन शो मे टो ट्रेफिक हारमोंस कार्य शरीर की लंबाई बढ़ाना अधिकता से रोग भीम का अतिका एकता एक रोमिली अकेली लक्षण शरीर की लंबाई अधिक हो जाती है कमी से रोग बौनापन प्रोलेक्टिन कार्य स्तन ग्रंथियों में दूध का निर्माण करना दूसरी आती है पश्चिम भाग न्यूरो हाइपोफिसिस ऑक्सीटॉसिन कार्य दूध का रावण गर्भाशय की भर्तियों में संकुचन द्वारा प्रसव पीड़ा कराना तथा पशु करवाना वैसलीन कार्य शरीर में जल की मात्रा नियंत्रण
 थायराइड ग्रंथि
यह ग्रंथ इस ऑप्शनली के दोनों ओर पाई जाती है हार्मोन थायरोक्सिन यह हार्मोन आयोडीन की उपस्थिति में बनता है अतः प्रतिदिन हमारे शरीर को 120 माइक्रोग्राम आयोडीन की जरूरत होती है थायरोक्सिन के कार्य उपापचय क्रिया पर नियंत्रण हृदय की धड़कन बढ़ाना वरुण के मस्तिष्क का विकास करना इसकी कमी से रोग गर्ल कंठ गंगा गाइडर लक्षण आयोडीन की कमी के कारण थायराइड ग्रंथि सोचकर फूल जाती है जिसे गला लटक जाता है यह रोग अधिकतर पहाड़ी क्षेत्रों में होता है क्रिश्चियनिज्म आयोडीन की कमी के कारण मंदबुद्धि बालक जिसके मस्तिष्क का विकास पूर्ण नहीं होता है अधिकता से रोग नेत्रों स्थान आयोडीन की अधिकता के कारण आंखें खोल कर बाहर की ओर आ जाती है तथा नजरें डरावनी हो जाती है थायराइड ग्रंथि एक मात्र 2 जोड़ी के रूप में पाई जाती है इसके द्वारा स्थापित होने वाला हार्मोन हार्मोन कार्य हमारे शरीर में रक्त के अंदर कैल्शियम की मात्रा का नियंत्रण करता है इसके अधिकता से रोग कमजोर हो जाती जो सामान्य बच्चों में होता है कमी से रोग पीनियल ग्रंथि पाई जाती इसका जाता है इसके द्वारा स्रावित हार्मोन कार्य हमारे शरीर में निर्माण विभाग में पाई जाती है मोहसिन हार्मोन स्रावित करती है तथा शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र को रोगों से लड़ने की क्षमता पर नियंत्रण करती है जो जो हमारी आयु बढ़ती जाती है कारण माना जाता है अग्नाशय ग्रंथि दीप अल्फा कोशिकाएं गोलू का गोना हार्मोन बीटा कोशिका इंसुलिन हार्मोन गामा कोशिकाएं सोमैटो स्टोन इन हारमोंस ग्लूकोकार्ड विनर इंसुलिन दोनों मिलकर रक्त में ग्लूकोज की मात्रा पर नियंत्रण करते हैं इंसुलिन की कमी से रोग डायबिटीज और मधु में होता है ऐड नलीनकंठी हमारी किडनी के ऊपर पाई जाती है जिससे एड्रीनलीन हार्मोन स्रावित होता है इसका कार्य उपापचय क्रिया पर नियंत्रण हृदय की धड़कन को बढ़ाना इससे संकटमोचक तथा जीवन रक्षक हार्मोन कहते हैं क्योंकि अचानक आने वाले संकट से में लड़ने की सहायता देता है

जिंदगी का सबसे हसीन पल

मेरे हो तो पुरुष विकल्प मिलेंगे बहुत मार्ग भटकाने के लिए
संकल्प तो एक ही काफी है मंजिल तक जाने के लिए

 हमने भी किसी से प्यार किया था
 कम नहीं बेशुमार किया था
जिंदगी बदल गई थी तब उसने कहा कि
पागल तो सच समझ बैठा मैंने तो मजाक किया था

प्यार हमने भी किया था उन्हें स्कूल के दिनों में
दिया था तब लेटर और जवाब आया किताब में छुप कर
कभी मुलाकात तो नहीं हुई क्योंकि कमबख्त किताब कभी हमने छुई  नहीं थी।


दिल पर क्या गुजरी वह अनजान क्या जाने
 प्यार किसे कहते हैं वह नादान क्या जाने
हवा के साथ उड़ गया घर इस परिंदे का
कैसा बना था घोसला वह तूफान क्या जाने


 हमारा अंदाज कुछ ऐसा है
 कि जब हम बोलते हैं तो बरस जाते हैं
 और जब हम चुप रहते हैं तो लोग तरस जाते हैं

 पत्ते गिर सकते हैं पेड़ नहीं
 सूरज डूब सकता है आसमान नहीं
 धरती सुख सकती है दरिया नहीं
 दुनिया सुधर सकती है पर आप नहीं


अनजान होना शर्म की बात नहीं है लेकिन
 सीखने की इच्छा ना होना शर्म की बात है

अगर कोई आपका दिल दुखाए तो उसका बुरा मत मानना क्योंकि यह कुदरत का नियम है कि जिस पेड़ के सबसे मीठे फल होते हैं उसी के सबसे ज्यादा पत्थर लगते हैं।

वादा ना करो अगर तुम निभा ना सको चाहो ना उसको जिसे तुम पा ना सको दोस्त तो दुनिया में बहुत होते हैं पर एक खास रखो जिसके बिना तुम मुस्कुरा ना सको।

नदी जब किनारा छोड़ देती है
राहे में चट्टान अथक तोड़ देती है
 बात छोटी सी अगर चुभ जाए दिल में तो
 जिंदगी के रास्तों को भी मोड़ देती है

नदी जब किनारा छोड़ देती है राहे में चट्टान तक तोड़ देती है बात छोटी सी अगर चुभ जाए दिल में तो जिंदगी के रास्तों को भी मोड़ देती है।

जिंदगी एक पल है
 जिसमें ने आज निकल है जी लो इसको इस तरह की
 जो भी आपसे मिले वह यही कहे
 बस यही मेरी जिंदगी का सबसे हसीन पल है

हर तलवार पर जाट की कहानी है
 तभी तो दुनिया जाट की दीवानी है
 मिट गए जाट को मिटाने वाले क्योंकि
दहकती आग में तपती जाट की जवानी है

 किसी का सरल स्वभाव उसकी कमजोरी नहीं होता है दुनिया में पानी से सरल कुछ भी नहीं है किंतु उसका तेज भाव बड़ी से बड़ी चट्टान के टुकड़े कर देता है।

क्यों कहते हो कि कुछ बेहतर नहीं होता सच यह है कि जैसा चाहो वैसा नहीं होता कोई तुम्हारा साथ ना दे तो गम ना कर खुद से बड़ा दुनिया में कोई हमसफ़र नहीं होता।

जब खामोश आंखो से बात होती है
 ऐसे ही मोहब्बत की शुरुआत होती है
 तुम्हारे ही ख्यालों में खोए रहते हैं
 पता नहीं कब दिन और कब रात होती है